राजभाषा अधिनियम 1963 क्या है? उद्देश्य, प्रावधान और महत्व | हिंदी में पूरी जानकारी

प्रस्तावना : 

    भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है, जहाँ विभिन्न राज्यों में अलग-अलग भाषाएँ बोली जाती हैं। इस भाषाई विविधता के बावजूद देश के शासन-प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए एक सामान्य भाषा की आवश्यकता थी। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान ने देवनागरी लिपि में हिंदी को भारत संघ की राजभाषा घोषित किया।

संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार, 26 जनवरी 1950 से अगले 15 वर्षों तक अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग सरकारी कार्यों में जारी रखने की व्यवस्था की गई थी। जब यह अवधि 1965 में समाप्त होने वाली थी, तब गैर-हिंदी भाषी राज्यों में यह आशंका उत्पन्न हुई कि केवल हिंदी लागू होने से उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। इसी स्थिति को संतुलित करने के लिए राजभाषा अधिनियम, 1963 लागू किया गया।

विषय-विवेचन : 

1. राजभाषा अधिनियम 1963 क्या है? 

    राजभाषा अधिनियम, 1963 एक ऐसा कानून है, जो यह निर्धारित करता है कि संघ के राजकीय प्रयोजनों, संसद, केंद्र और राज्यों के बीच संचार तथा न्यायालयों में हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रयोग किस प्रकार किया जाएगा।इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य हिंदी को बढ़ावा देना है, लेकिन साथ-साथ अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग को भी व्यावहारिक दृष्टि से बनाए रखना है।

2. राजभाषा अधिनियम, 1963 का उद्देश्य क्या हैं ? 

    राजभाषा अधिनियम का मुख्य उद्देश्य था की, 

  1. संघ के राजकीय प्रयोजनों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना,
  2. अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग को आवश्यक क्षेत्रों में जारी रखना,
  3. राज्यों के बीच तथा केंद्र-राज्य संबंधों में भाषाई संतुलन बनाए रखना।
3. हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रयोग 

    इस अधिनियम के अनुसार, 26 जनवरी 1965 के बाद भी संघ के राजकीय कार्यों और संसद के कार्य-व्यवहार में हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग जारी रहेगा। इसका अर्थ यह है कि हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद अंग्रेज़ी को पूरी तरह हटाया नहीं गया। केंद्र सरकार और उन राज्यों के बीच, जिन्होंने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया है, पत्राचार अंग्रेज़ी में होगा। वहीं, हिंदी अपनाने वाले राज्यों के साथ हिंदी में पत्राचार किया जा सकता है।

4. केंद्र और राज्यों के बीच संचार

    अधिनियम में केंद्र और राज्यों के बीच पत्राचार के लिए स्पष्ट व्यवस्था की गई है, 

  1. हिंदी भाषी राज्यों के साथ केंद्र का पत्राचार हिंदी में,
  2. गैर-हिंदी भाषी राज्यों के साथ अंग्रेज़ी में या उनकी सहमति से हिंदी में,
  3. यदि किसी राज्य के साथ हिंदी में पत्राचार होता है, तो उसके साथ अंग्रेज़ी अनुवाद भी भेजा जाएगा।
इससे प्रशासनिक स्पष्टता बनी रहती है और किसी राज्य को भाषा के कारण असुविधा नहीं होती।

5. संसद और सरकारी दस्तावेज
    राजभाषा अधिनियम के अनुसार संसद में कार्यवाही हिंदी या अंग्रेज़ी दोनों में हो सकती है। इसके अतिरिक्त
  1. संकल्प, नियम, अधिसूचनाएँ, आदेश, रिपोर्ट और प्रेस विज्ञप्तियाँ
  2. सरकारी अनुबंध, लाइसेंस, निविदाएँ और समझौते

इन सभी का प्रकाशन हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जाना आवश्यक है। इससे जनता को सरकारी जानकारी आसानी से उपलब्ध होती है।

6. राजभाषा समिति की व्यवस्था

    इस अधिनियम में राजभाषा के प्रयोग की प्रगति की समीक्षा के लिए राजभाषा समिति के गठन का प्रावधान है।यह समिति : 

  1. हिंदी के प्रयोग की स्थिति की जाँच करती है। 
  2. राष्ट्रपति को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करती है,
  3. और राष्ट्रपति उन सिफारिशों को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखते हैं।
7. न्यायालयों में भाषा का प्रयोग

    उच्च न्यायालयों में सामान्यतः अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग होता है, परंतु इस अधिनियम के अंतर्गत यह व्यवस्था की गई कि राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से किसी राज्य में हिंदी या उस राज्य की राजभाषा का प्रयोग किया जा सकता है, बशर्ते साथ में अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध हो।यह प्रावधान न्यायिक कार्यों में पारदर्शिता और समझ को बढ़ाता है।

8. अधिनियम का व्यावहारिक महत्व

        राजभाषा अधिनियम, 1963 के कारण, 

  1. केंद्र सरकार के कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग बढ़ा। 
  2. राजभाषा अधिकारी और अनुवादक जैसे पदों का सृजन हुआ। 
  3.  सरकारी कर्मचारियों को हिंदी प्रशिक्षण दिया जाने लगा।
यह अधिनियम प्रशासनिक एकरूपता और भाषाई सम्मान—दोनों को बनाए रखता है।

9. सीमाएँ और चुनौतियाँ 
    यद्यपि यह अधिनियम संतुलित है, फिर भी कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं, जैसे की, 
  1. अंग्रेज़ी का अत्यधिक प्रभाव। 
  2. तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में हिंदी शब्दावली की कमी। 
  3. हिंदी में कार्य करने के प्रति मानसिक झिझक।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।

निष्कर्ष : 
    राजभाषा अधिनियम, 1963 भारत की भाषाई नीति का एक महत्वपूर्ण आधार है। यह अधिनियम हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित करता है, साथ ही अंग्रेज़ी के व्यावहारिक प्रयोग को भी स्वीकार करता है। इससे देश की भाषाई विविधता का सम्मान बना रहता है और प्रशासनिक कार्यों में निरंतरता बनी रहती है। आज आवश्यकता है कि हिंदी को केवल औपचारिक भाषा न मानकर कार्यक्षेत्र की प्रभावी भाषा बनाया जाए। सरल भाषा, बेहतर अनुवाद और आधुनिक शब्दावली के माध्यम से हिंदी को और अधिक सशक्त बनाया जा सकता है।

अंततः कहा जा सकता है कि राजभाषा अधिनियम, 1963 राष्ट्रीय एकता, प्रशासनिक सुविधा और भाषाई संतुलन का प्रतीक है, और इसका प्रभावी क्रियान्वयन भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे को मजबूत करता है। 

 FAQ (Frequently Asked Questions)

राजभाषा अधिनियम 1963 क्या है?

राजभाषा अधिनियम 1963 वह कानून है, जो यह निर्धारित करता है कि भारत संघ के राजकीय कार्यों, संसद, केंद्र–राज्य संचार और न्यायालयों में हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रयोग किस प्रकार किया जाएगा।

राजभाषा अधिनियम 1963 क्यों बनाया गया?

यह अधिनियम हिंदी को राजभाषा के रूप में बढ़ावा देने और गैर-हिंदी भाषी राज्यों की भाषाई चिंताओं को दूर करने के लिए बनाया गया।

क्या राजभाषा अधिनियम अंग्रेज़ी को समाप्त करता है?

नहीं, यह अधिनियम अंग्रेज़ी को समाप्त नहीं करता। इसके अंतर्गत हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी का प्रयोग भी जारी रखने की व्यवस्था की गई है।

केंद्र और राज्यों के बीच किस भाषा का प्रयोग होता है?

हिंदी भाषी राज्यों के साथ हिंदी में और गैर-हिंदी भाषी राज्यों के साथ अंग्रेज़ी में पत्राचार किया जाता है। सहमति होने पर हिंदी का प्रयोग भी संभव है।

राजभाषा अधिनियम का प्रशासनिक महत्व क्या है?

इस अधिनियम से सरकारी कार्य अधिक जन-सुलभ बने, हिंदी के प्रयोग में वृद्धि हुई और राजभाषा अधिकारी व अनुवादक जैसे पदों का सृजन हुआ।



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